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जीवन — ईश्वर द्वारा दिया गया सबसे अद्भुत उपहार है। यह उपहार जन्मते ही मिलता है और मनुष्य की अंतिम साँस तक किस्तों में मिलता रहता है। ये किश्तें एक माला में पिरोये मोती की तरह निरंतरता को परिभाषित करती हैं। हरेक मोती चौबीस घंटे का समय कहलाता है और यह एक स्फटिक की तरह स्वच्छ व सुन्दर, बेदाग, दमकता हुआ — अपना प्रकाश ऊगते सूरज की रश्मियों के साथ अपने चारों ओर बिखरे संसार को दमकाता हुआ होता है। चूंकि यह उपहार बिन माँगे — बिना प्रतीक्षा किये –नियमित रूप से मिलता रहता है, इसलिये मनुष्य में इस उपहार पाने की न तो उमंग होती है — न ही उसकी प्राप्ति उल्लास जगाती है — न ही मनुष्य को उपहार देनेवाले के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने की चाह पनपाती है। कभी कभी तो आँखें मूँदें सोते रह जाने पर भी यह उपहार सिराहने रखा मिल जाता है — बंद खिड़कियों व दरवाजों के बावजूद साँसों को चलते रहने के लिये मिल जाता है। यह उपहार देनेवाला यह नहीं देखता कि पानेवाला राजा है या रंक। वह तो सबको मात्र चौबीस घंटे देता है। वह यह भी नहीं देखता कि कल दिये गये चौबीस घंटे का उपयोग किस तरह से किया गया है। वह कोई कटौती नहीं करता। हर रोज सुबह की पवित्र लाल रश्मियों के रिबिन से बँधा चौबीस घंटे का नया तोहफा पूर्व में मिले तोहफे के समान होता है, एकदम पूर्ण सौन्दर्य से परिपूर्ण। हरेक को निर्धारित मात्रा में मिला यह उपहार सबके लिये एक समान अखंड़ प्रेम, अनंत आशीर्वाद, असंख्य शुभकामनाओं व अनेकानेक संभावनाओं भरा हुआ होता है।

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